जानिए क्यों हुआ देवी गंगा का नदी के रूप में पृथ्वी पर अवतरण

यह बात है सतयुग कि जब अयोध्या पर भगवन राम के पूर्वज राजा सागर शासन कर रहे थे । राजा सागर ने 99 बार अश्वमेध यज्ञ (अश्व यज्ञ) किया। हर बार वे घोड़े को पृथ्वी के चारों ओर भेज दिया करते, जो कि बिना किसी रूकावट के वापस भी लौट आता । 99वे बार सफलतापूर्वक यह यज्ञ संपन्न हो जाने पर राजा ने 100वीं बार यह यज्ञ करने का निर्णय लिया, जिससे वह पृथ्वी का सम्राट बन जाए ।

जब देवराज इंद्र ने यह देखा, तो वह राजा सागर की बढ़ती शक्ति से चिंतित हो उठे । इससे पहले कि राजा सागर १००वी बार अश्वमेध यज्ञ अनुष्ठान संपन्न करते देवराज इंद्र ने घोड़े को चुराकर उस पेड़ से बांध दिया जिसके नीचे कपिल मुनि ध्यान कर रहे थे।

जैसे ही दरबारियों ने घोड़े के गायब होने की खबर राजा तक पहुंचाई तो राजा ने बिना समय नष्ट किये अपने 60,000 बेटों को घोड़ा खोजने का आदेश दे दिया। घमंडी राजकुमारों ने घोड़े की खोज में स्थानों को जलाना और नष्ट करना शुरू कर दिया । जैसे ही सारे राजकुमार कपिल मुनि के आश्रम पहुंचे और घोड़े को पेड़ से बंधा देखा तो उन्होंने धोके में मुनि को ही अपहरणकर्ता समझा और उन पर हमला कर दिया। अपमानित महसूस करते हुए, कपिल मुनि ने राजकुमारों को अपनी तीसरी आँख से निकली योगिक अग्नि से राख कर दिया।

जब राजा सागर के अंतिम शेष पुत्र अंशुमन को अपने भाइयों की दुर्गति के बारे में ज्ञात हुआ तो उसने कपिल मुनि से विनती कर पूछा कि उनकी आत्माओं को राख से मुक्ति देने का उपाय बताएं । मुनि ने अंशुमन को उपाय बताया की वे जगतपिता ब्रह्मा को तप द्वारा प्रसन्न कर गंगा को उनके कमंडल से मुक्त कराएं । गंगा के पृथ्वी पर अवतरित होते ही अपने भाइयों की राख को उससे शुद्ध करने पर उन्हें मुक्ति मिल जाएगी ।

बेहद जटिल यह कार्य संपन्न होने में कई पीढ़ियां लग गयीं । राजा सागर की सातवीं पीढ़ी में, भागीरथ का जन्म हुआ था। राजा भागीरथ ने अपना राज्य छोड़ दिया और अपने पूर्वजों की आत्माओं के उद्धार के लिए मध्यस्थता करने लगे। भगीरथ ने एक हजार वर्षों तक भगवान ब्रह्मा की तपस्या की, गंगा को स्वर्ग से धरती पर आने और अपने पूर्वजों की राख को शाप से मुक्त करने और उन्हें स्वर्ग जाने की अनुमति देने का अनुरोध किया।

भक्ति से प्रसन्न होकर, भगवान ब्रह्मा ने भागीरथ की इच्छा को स्वीकार कर लिया, लेकिन उसे भगवान शिव से प्रार्थना करने के लिए कहा, ताकि वह गंगा के बल को अपने बालों में धारण करने के लिए स्वीकार करे, ऐसा न हो कि वह पूरी पृथ्वी को अभिभूत कर दे।

इस प्रकार भागीरथ ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए और तपस्या की। जब गंगा स्वर्ग से उतरीं, तो भगवान शिव ने आकाश को अपने बालों के तले ढक दिया, ताकि पृथ्वी पर एक बूंद भी न गिरे। जब उन्होंने गंगा पर पूरी तरह से कब्जा कर लिया, तो भगवान शिव ने गंगा के बल का एक छोटा हिस्सा पृथ्वी पर जारी किया और उनसे कहा कि वे भागीरथ का पालन करें। इसने भगवान शिव को गंगाधर का नाम दिया, उन्होंने गंगा नदी को धारण किया।

मूल रूप से गंगा ने संत जनु के आश्रम में बाढ़ आ गई, उन्होंने उसे सम्मान के रूप में एक सबक के रूप में निगल लिया और केवल भागीरथ के लिए गंगा को दया से मुक्त कर दिया। भागीरथ के अनुसरण में जहां भी गंगा बहती है, लोग बड़ी संख्या में स्नान करने और शुद्धि प्राप्त करने के लिए आते हैं।

अंत में गंगा कपिल मुनि के आश्रम में पहुंची और 60,000 आत्माओं को उनकी राख से मुक्त किया।


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