आखिर क्यों मिला राम अवतार में भगवान विष्णु को स्त्री वियोग

सभी जीव चाहे मनुष्य हों या भगवान, सब सृष्टि के नियमों से बन्धे हुए हैं । अगर हमारे कृत्य से किसी के भी मन्न को ठेस पहुंचती है तो सृष्टि के न्याय चक्र के अनुसार हमें उसके परिणाम भोगने पडते हैं । स्वयं भगवान विष्णु भी इस न्याय चक्र से नहीं बच पाए।

क्या है पूरी कथा

पौराणिक कथाओं के अनुसार नारद मुनि के श्राप के कारण भगवान विष्णु को राम अवतार के दौरान स्त्री वियोग में जीवन व्यतीत करना पढ़ा था। हुआ यूं की एक बार देवराज इन्द्र नारद मुनि की घोर तपस्या से असहज महसूस करने लगे। उन्हें लगा की उनका आसन असुरक्षित है और इस ही पसोपेश की अवस्था में उन्होनें देवर्षि नारद के तप में ना-ना प्रकार के विध्न पहुंचाने की कोशिश की । पर देवर्षि नारद शिव जी द्वारा उनके तप के स्थान को मिली अनुकम्पा से अनभिज्ञ थे । इस ही कारण से नारद मुनी के सामने कई सारे देवों के अतिरिक्त कामदेव को भी निराशा ही हाथ लगी । अपने सामने देवों की ऐसी दुर्दशा देख देवर्षी नारद को अभिमान हो गया की उन्होनें प्रेम, काम और इच्छाओं पर विजय प्रप्त कर ली है तथा पूरी सृष्टि में किसी में भी उनकी तपस्या भंग करने का सामर्थ्य नहीं है ।

बस फिर क्या था देवर्षि नारद ने अपनी यह बढाई शिव जी के सामने की, तो शिव जी समझ गये कि नारद मुनि अहंकार के ग्रास हो गए हैं । भगवान भोलेनाथ ने नारद मुनि से कहा की यह तो बड़ी ही प्रसन्नता की बात है पर इस बात का भान भगवान श्री हरि (श्री विष्णु) को ना लगने दें अन्यथा उन्हें भी आपसे ईर्ष्या होने लगेगी । परन्तु देवर्षि नारद कहाँ मानने वाले थे उन्होंने श्री हरि के सामने भी अपनी बढाई कर दी । तब भगवान श्री विष्णु ने देवर्षि नारद का अभिमान तोड़ने का उपाय किया ।

इसके पश्चात, देवर्षि नारद कहीं जा रहे थे कि अचानक उनहोंने देखा कि एक नगर में किसी अति सुन्दर राजकुमारी का स्वयंवर हो रहा है | तो उनहोंने भी उस स्वयंवर में भाग लेने का मन बना लिया । उस राजकुमारी का सौंदर्य देख कर नारद मुनि का तप भंग हो चुका था और वह विष्णु जी के पास पहुँच गए और उनका सुन्दर रूप मांगते हुए कहा कि मुझे हरी की तरह बना दो। हरी का एक अर्थ वानर भी होता है । तो विष्णु ने ऐसा ही किया और उनका मुख वानर की तरह बना दिया। नारद मुनि जी इसी तरह स्वयंवर में पहुँच गए और जब राजकुमारी ने उन्हें देखा तो वह बहुत क्रोधित हो गई। तब विष्णु जी वहां पहुंचे और राजकुमारी ने उन्हें अपने पति के रूप में स्वीकार किया। यह देख कर सब लोग हंसने लगे और उनका उपहास उड़ाने लगे। तब नारद मुनि जी को बहुत क्रोध आया और उन्होंने श्री विष्णु जी को श्राप दिया कि एक दिन ऐसा आएगा जब विष्णु जी को स्त्री वियोग सहना पढ़ेगा और तब वानर उनकी सहायता करेंगे ।

अपने परम भक्त से मिले इस श्राप को विष्णु जी ने सहजता के साथ स्वीकारा । पर जैसे ही नारद माया जाल से मुक्त हुए तो उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ और उन्होनें श्री विष्णु से माफी मान्गी । भगवान विष्णु ने उन्हें क्षमा तो कर दिया परन्तु इसके फल स्वरूप उन्हें राम अवतार के दौरान माता सीता से वियोग के रूप में सहना पढ़ा ।

लेखक – चेतन मित्तल

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